बिलासपुर, छत्तीसगढ़ की दूसरी सबसे बड़ी शहर और न्यायधनी, जिसे स्मार्ट सिटी के रूप में जाना जाता है, आज अपनी बदहाली की कहानी खुद बयां कर रही है। यह शहर सरकार और अधिकारियों की लापरवाही का शिकार हो गया है, जहां आम लोगों को मूलभूत सुविधाएं तक नहीं मिल पा रही हैं।
क्या यही है स्मार्ट सिटी का अर्थ? क्या यही है सरकार की योजनाओं का परिणाम? जब टैक्स तो वसूल किया जा रहा है, लेकिन सुविधाएं अधूरी हैं। जब अधिकारी एसी रूम में बैठकर आदेश देते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत को नहीं समझते।
बिलासपुर की सड़कें गड्ढे से भरी हैं, बिजली कटौती आम बात है, स्ट्रीट लाइट महीनों तक बंद रहती है, और गायों की आवाजाही से होने वाले हादसे आम हो गए हैं। ट्रैफिक समस्या इतनी ज्यादा है कि लोग कहीं भी वाहन खड़े कर देते हैं और कहीं भी वाहन चला देते हैं।
क्या सरकार और अधिकारी इस शहर के लोगों की परेशानी को समझने को तैयार हैं? क्या वे अपने दायित्व को पहचानते हैं? आम लोगों के लिए क्या उनकी कोई जिम्मेदारी है या नहीं?
यह समय है सरकार और अधिकारियों को अपने दायित्व को समझने का, अपनी जिम्मेदारी को पहचानने का। यह समय है आम लोगों की परेशानी को दूर करने का, स्मार्ट सिटी को वास्तव में स्मार्ट बनाने का।
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