निर्देशक प्रेम चंद्राकर और भूपेंद्र साहू की फिल्म पर उठे सवाल—बिना समझ, बिना संरचना और बिना संवेदना की प्रस्तुत




आज रिलीज़ हुई फिल्म “मया देदे मयारू पार्ट-2” ने दर्शकों को मनोरंजन देने के बजाय उलझन और निराशा ही दी है। फिल्म देखने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या मेकर्स ने सच में फिल्म बनाने से पहले फिल्ममेकिंग की बुनियादी समझ भी हासिल की थी?

फिल्म की कहानी जमीन विवाद जैसे गंभीर विषय से शुरू होती है, लेकिन कुछ ही देर में पूरी तरह बिखर जाती है। एक ओर गाँव का किसान अपनी जमीन बचाने की लड़ाई लड़ रहा है, तो दूसरी ओर उसका बेटा उसी व्यक्ति की बेटी से प्यार कर बैठता है जो जमीन खरीदना चाहता है। यहां तक तो कहानी में संभावनाएं थीं, लेकिन इसके बाद जो होता है, वह न सिर्फ बेतुका है बल्कि दर्शकों की समझ का भी अपमान है।

सीन का कोई तारतम्य नहीं—किरदार कभी भी कहीं भी आ-जा रहे हैं, बिना किसी लॉजिक के। इंटरवल के बाद अचानक यह खुलासा कि बड़ा बेटा असली नहीं है, कहानी को और कमजोर कर देता है। यह ट्विस्ट न तो इमोशनल इम्पैक्ट डालता है और न ही कहानी को मजबूती देता है।

फिल्म में कुल 6 गाने हैं, लेकिन ऐसा लगता है जैसे कहानी गानों के बीच कहीं खो गई है। यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि यह “गानों में फिल्म” है या “फिल्म में गाने”।

तकनीकी पक्ष की बात करें तो स्थिति और भी चिंताजनक है।
• VFX इतना कमजोर है कि हर सीन नकली लगता है
• एडिटिंग इतनी खराब कि सीन जंप करते नजर आते हैं
• स्क्रीनप्ले पूरी तरह असंगठित और बिखरा हुआ

यहां तक कि एक्शन सीन में भी गोली चलती है, लेकिन यह तक साफ नहीं होता कि गोली किस पर चली और उसका असर क्या हुआ।

फिल्म का क्लाइमेक्स भी पुराने 70 के दशक की घिसी-पिटी फॉर्मूला स्टोरी जैसा है—लड़की का पिता बॉयफ्रेंड को मारने की साजिश करता है, लड़की सब सुन लेती है, और फिर दोनों गांव आकर माफी मांगते हैं। कोई नया एंगल, कोई ताजगी नहीं।

सबसे बड़ी निराशा यह है कि पूरी फिल्म में एक भी ऐसा सीन या संदेश नहीं है जिसे दर्शक याद रख सकें।

निष्कर्ष:
“मया देदे मयारू पार्ट-2” सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि दर्शकों के समय और उम्मीदों के साथ किया गया एक असफल प्रयोग है। इस फिल्म को देखकर यही लगता है कि मेकर्स को पहले फिल्ममेकिंग की बुनियादी समझ पर काम करना चाहिए, तभी दर्शकों के सामने कुछ परोसना चाहिए

अगर ऐसे ही कंटेंट परोसा जाएगा, तो दर्शक सिनेमाघरों से दूरी बनाना ही बेहतर समझेंगे।

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