सीजी फ़िल्म इंडस्ट्री में एक गंभीर चुनौती सामने आ रही है, जो भाई भतीजा वाद के चलन के रूप में सामने आ रही है। यह चलन न केवल इंडस्ट्री के लिए बल्कि नए और प्रतिभाशाली कलाकारों के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन गया है।
दिलेश साहू का उदाहरण इस बात का प्रमाण है कि भाई भतीजा वाद के चलन के कारण प्रतिभाशाली कलाकारों को भी अपनी पहचान बनाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। दिलेश साहू ने 10-12 फ़िल्में की हैं, लेकिन फिर भी वे पहचान के लिए मोहताज हैं।
सीजी फ़िल्म इंडस्ट्री के इतिहास को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि जो भी हीरो आज कामयाब हुए हैं और अपनी पहचान बनाई है, वे सभी आउटसाइडर हैं जिनका कोई गॉडफ़ादर नहीं रहा है। अनुज शर्मा, करण ख़ान, मन कुरैशी, अमलेश नागेश जैसे कलाकारों का उदाहरण इस बात का प्रमाण है कि प्रतिभा और मेहनत के बल पर कामयाबी हासिल की जा सकती है।
हीरो बनने के लिए जेब में धन राशि से ज़्यादा टैलेंट होना भी अति आवश्यक है। बिना टैलेंट के पब्लिक का प्यार और तालियाँ बहुत दूर की बात है। आम लोगों और जानता के प्रति स्वभाव भी एक कलाकार की छवि को दर्शाता है। एक कलाकार को तारीफ़ के साथ साथ आलोचना सुनने की भी हिम्मत होनी चाहिए।
सीजी फ़िल्म इंडस्ट्री में भाई भतीजा वाद के चलन को रोकने के लिए फ़िल्म मेकर्स को भी समझने की ज़रूरत है कि बिना टैलेंट के हीरो को फ़िल्म में रखना मतलब इंडस्ट्री और कहानी के साथ नाइंसाफ़ी करना है।
अब आगे देखने वाली बात होगी कि आख़िर भाई भतीजा वाद से हटकर कुछ होगा या जिसका पैसा वो हीरो वाला थीम चलता रहेगा। यह समय ही बताएगा कि सीजी फ़िल्म इंडस्ट्री में क्या बदलाव आएगा और क्या नए और प्रतिभाशाली कलाकारों को मौका मिलेगा।
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