"डोली लेके आजा: एक फ़िल्म जो अपने निर्देशक की कमजोरी का शिकार है।"

क्या आप जानते हैं कि जब एक निर्देशक को फ़िल्म बनाने का अनुभव नहीं होता है, तो क्या होता है? डोली लेके आजा जैसी फ़िल्में बनती हैं!

यह फ़िल्म एक भूत प्रेत की कहानी पर आधारित है, लेकिन इसका निर्देशन इतना कमजोर है कि दर्शकों को समझने में मुश्किल होती है कि कहानी कहाँ से शुरू होती है और कहाँ ख़त्म होती है।

फ़िल्म के कलाकारों ने भी अपनी भूमिकाओं को अच्छी तरह से निभाने में असफल रहे हैं कुछ सीनियर कलाकारों को छोड़ कर। हीरोइन किसी भी एंगल से हीरोइन नहीं लगती है, जो दर्शकों के दिल में जगह बना पाये। वह बस एक पुतले की तरह लगती है, जो अपने संवादों को पढ़कर कहती है। हीरो का वही छवि है जो एल्बम में नजर आता है, बस एक एल्बम कलाकार की तरह।

फ़िल्म का म्यूजिक बहुत अच्छा है लेकिन फ़िल्म में इतने गाने है कि दर्शकों को लगता है कि वे किसी एल्बम को सुन रहे हैं, और दर्शक सिर्फ़ गाना सुनने अपना क़ीमती समय और पैसा खर्च नहीं करना चाहेंगे क्योंकि गाना तो यूट्यूब पर भी सुना जा सकता है। 

फ़िल्म की एडिटिंग और मिक्सिंग? भूल जाइए! यह फ़िल्म एक स्कूल के प्रोजेक्ट की तरह लगती है, न कि एक पेशेवर फ़िल्म की तरह।

निर्देशक ने यूट्यूबर्स के शक्तियों का ग़लत इस्तेमाल किया है, फ़िल्म में काम के नाम पर सिर्फ़ झुनझुना दिया है। पूरी फ़िल्म में इतना एक्सपेरिमेंट किया गया है जिसका कोई नतीजा भी नज़र नही आता है। 

लगता है प्रोड्यूसर अब मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल बनवायेंगे क्योंकि इस फ़िल्म का पार्ट टू भी आने वाली है! भगवान जाने कि उसमें क्या होगा। क्या निर्देशक अपनी कमियों को सुधार पाएंगे? या फिर दूसरा पार्ट भी उसी तरह की होगी जैसे पहला पार्ट है? 

कुल मिलाकर, डोली लेके आजा एक फ़िल्म है जो अपने निर्देशक की कमजोरी का शिकार है। यह फ़िल्म एक उदाहरण है कि जब एक निर्देशक को फ़िल्म बनाने का अनुभव नहीं होता है, तो क्या होता है। तो अगर आप अपना समय और पैसा  बर्बाद नहीं करना चाहते हैं, तो फ़िल्म डोली लेके आजा को सिनेमहॉल में सोच समझ कर देखे। क्योंकि फ़िल्म कुछ दिनों या महीनों में ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर आ ही जाएगी। 

फ़िल्म से जुड़ी बाक़ी जानकारी पब्लिक रिव्यू के बाद पढ़ते रहिए बिलासपुर टाइम।

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