"सरकंडा पुलिस का दोहरा चेहरा: रसूखदारों को चाय पिलाने की जिम्मेदारी, तो वही आम लोगों को दर-दर भटकना पड़ रहा"

बिलासपुर में सरकंडा पुलिस का दोहरा चेहरा सामने आया है, जो बहुत ही चिंता का विषय है। रसूखदारों के आगे सरकंडा पुलिस नतमस्तक होते नजर आते हैं, जबकि आम लोगों को थाने में दर-दर भटकना पड़ता है। यह दोहरा मापदंड क्या पुलिस के लिए उचित है?

बिलासपुर के सभी पुलिस थाने में एक अलग टीम होती है, जिसे सिविल टीम कहते हैं। ये लोग वर्दी में नहीं रहते हैं और अपने आप को एसपी से कम नहीं समझते हैं। वे आवेदकों से सीधे मुंह बात  तक नहीं करते हैं, जो आम लोगों के लिए बहुत ही परेशानी का कारण बनता है।

रसूखदारों के थाने में घुसते ही चाय पानी की व्यवस्था पूछे जाने के पीछे क्या कारण है? क्या पुलिस का मुख्य उद्देश्य लोगों को थाने में चाय पिलाना है या लॉ एंड ऑर्डर का पालन कराना है? यह सवाल उठता है कि क्या पुलिस की जिम्मेदारी सिर्फ रसूखदारों को चाय पिलाना है या आम लोगों की सुरक्षा और न्याय की रक्षा करना है?

यदि चाय पानी पिलाने का इतना ही शौक है, तो सभी से क्यों नहीं पूछा जाता है चाय पानी? क्या आम लोगों को चाय पिलाने की जरूरत नहीं है? यह दोहरा मापदंड क्यों है? क्या पुलिस को लगता है कि आम लोगों की समस्याएं अपने आप हल हो जाएंगी?

यह सवाल उठता है कि क्या पुलिस की यह कार्यशैली न्यायपालिका के सिद्धांतों के अनुसार है? क्या यह दोहरा मापदंड न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध नहीं है? यह जरूरी है कि पुलिस प्रशासन के उच्च अधिकारी इस मामले की जांच करे और आम लोगों के हित में कार्य करे।

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