“एमसीबी 3” का रिलीज विवादों में: क्या मनोरंजन इंसानियत से बड़ा हो गया है?


साल 2000 में आई फ़िल्म एमसीबी ने दर्शकों के दिलों में जो जगह बनाई थी, वह आज भी यादगार है। दमदार अभिनय, दिल छू लेने वाली कहानी और पुराने कलाकारों की मौजूदगी ने इसे एक क्लासिक बना दिया। पिछले साल जब एमसीबी 2 रिलीज़ हुई, तो दर्शकों की उम्मीदें आसमान छू रही थीं। लेकिन जब फ़िल्म में पुराने किसी भी कलाकार को नहीं लिया गया, तो फैन्स ने तीखी नाराज़गी जताई।

अब एमसीबी 3 भी रिलीज़ के मुहाने पर खड़ी है, लेकिन इसके इर्द-गिर्द उठ रहे सवाल इससे कहीं ज़्यादा गंभीर हैं। मिली जानकारी के अनुसार शूटिंग के दौरान एक लाइटिंग टीम के सदस्य की दुखद मृत्यु हो गई — वह सेट पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। जहाँ ऐसी स्थिति में शूटिंग रोकना, सम्मान देना और इंसानियत दिखाना अपेक्षित होता है, वहीं डायरेक्टर सतीश जैन ने एक दिन की भी शूटिंग नहीं रोकी।(सूत्रों के हवाले)

क्या अब फ़िल्म का बजट इंसान की जान से भी ज़्यादा अहम हो गया है? क्या मनोरंजन के नाम पर संवेदनाओं को दरकिनार करना जायज़ है?

यह सवाल अब सिर्फ़ फ़िल्म के कलाकारों या निर्देशक से नहीं, बल्कि दर्शकों से भी है। क्या हम ऐसी फ़िल्मों को देखकर अप्रत्यक्ष रूप से इस रवैये को समर्थन दे रहे हैं?

एमसीबी 3 का आना तय है, लेकिन क्या इसका स्वागत भी तय है? जवाब अब जनता के हाथ में है — वो जनता जो न सिर्फ़ मनोरंजन चाहती है, बल्कि इंसानियत और ज़िम्मेदारी की उम्मीद भी रखती है।

अब ये देखना होगा कि दर्शक किसका साथ देंगे — सिनेमाई ग्लैमर का या इंसानी मूल्य का।

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