सीजी सिनेमा की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘मोर छैंहा भुइयाँ 3’ 16 मई को रिलीज़ के लिए तैयार है। सतीश जैन द्वारा निर्देशित इस फिल्म का पहला भाग 2000 में आया था, जिसने छत्तीसगढ़ी सिनेमा को नई पहचान दी। दूसरा भाग पिछले साल आया जो औसत हिट रहा, लेकिन पुराने लोकप्रिय कलाकारों की अनदेखी ने दर्शकों को खलासा भी किया।
लेकिन तीसरे भाग की चमक के पीछे एक अंधेरा भी छिपा है-वो अंधेरा जिसे जानबूझकर छुपाने की कोशिश की गई।
एक रोशनी बुझ गई, पर कैमरा चलता रहा
शूटिंग के दौरान एक लाइटमैन की एक्सीडेंट में मौत हो गई। यह कोई मामूली घटना नहीं थी। वह एक मेहनतकश कलाकार था जो पर्दे के पीछे से सपनों को रोशनी देता है। लेकिन सूत्रों के अनुसार, निर्देशक सतीश जैन ने न तो शूटिंग रोकी, न ही टीम को मानसिक विराम दिया। एक इंसान की मौत के बाद भी कैमरे का रोल चलता रहा, मानो कुछ हुआ ही नहीं।
यह केवल संवेदनहीनता नहीं, बल्कि उन हज़ारों फिल्मकर्मियों की गरिमा पर चोट है जो अपने खून-पसीने से एक फिल्म को ज़िंदा करते हैं।
सवाल ये है…
क्या फिल्म बनाना इतना बड़ा लक्ष्य हो गया है कि इंसानियत का गला घोंट दिया जाए?
क्या एक नामचीन निर्देशक से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह अपने क्रू के प्रति ज़िम्मेदारी निभाए?
क्या दर्शकों को सिर्फ "मनोरंजन" चाहिए, या वे जानना चाहेंगे कि उस पर्दे के पीछे कौन-कौन कुचला गया?
बदलाव की चिंगारी यहीं से उठती है…
यह खबर केवल एक एक्सीडेंट की नहीं है। यह एक सवाल है हमारी संवेदना, हमारी पत्रकारिता और हमारी सामाजिक चेतना का। शायद अब वक्त आ गया है कि दर्शक भी सोचें — सिर्फ पर्दे के सितारों को नहीं, पर्दे के पीछे की सच्चाई को भी देखा जाए।
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