पंडरिया।
प्रदेश के सबसे बड़े सरदार वल्लभभाई पटेल शक्कर कारखाना के निजीकरण को लेकर किसानों के बीच भारी रोष और चिंता की लहर दौड़ गई है। आज किसान संघ और जिला कलेक्टर के बीच इस मुद्दे पर एक अहम बैठक संपन्न हुई, जहां किसानों ने अपनी गहरी नाराज़गी जताई।
मिली जानकारी के अनुसार, निजीकरण की प्रक्रिया अगर पूरी होती है तो किसानों को सीधे तौर पर कई गंभीर नुकसान झेलने पड़ सकते हैं। बोनस से वंचित होने का खतरा, गन्ना का रेट घटाने की आशंका, गन्ने की लंबाई पर कटौती और रिकवरी का लाभ न मिलने जैसी स्थितियाँ साफ दिखाई दे रही हैं।
किसान संघ के नेताओं का कहना है कि ट्रिपल इंजन की सरकार और खुद को "किसान हितैषी" बताने वाली भाजपा अब उन्हीं किसानों के अधिकार छीनने पर आतुर है, जिनके दम पर प्रदेश की अर्थव्यवस्था खड़ी है।
कारखाना में मौजूदा बारह सौ कर्मचारियों की संख्या घटाकर महज दो सौ करने की तैयारी भी जताई जा रही है, जिससे हजारों परिवारों के पेट पर लात पड़नी तय है। निजी हाथों में जाने के बाद कर्मचारी शोषण का सामना करेंगे, और किसानों को उनका वाजिब मूल्य और अधिकार मिलना भी मुश्किल हो जाएगा।
इधर पंडरिया क्षेत्र की विधायक भावना बोहरा को लेकर भी किसानों में भारी नाराज़गी दिख रही है। किसानों का कहना है कि अगर विधायक समय रहते इस मुद्दे पर खुलकर किसानों का पक्ष नहीं लेतीं, तो आगामी चुनाव में उन्हें भारी विरोध झेलना पड़ेगा। लाखों किसानों और कर्मचारियों के हक से खिलवाड़ करना कहीं न कहीं वोट बैंक के सीधे नुकसान में तब्दील हो सकता है।
जैसे-जैसे शक्कर कारखाने के निजीकरण की खबरें फैल रही हैं, वैसे-वैसे आम जनता, किसानों और कर्मचारियों के बीच असंतोष गहराता जा रहा है। यह सिर्फ एक फैक्ट्री का मामला नहीं है, बल्कि किसानों के भविष्य, उनके बच्चों के पेट और पूरे क्षेत्र की आर्थिकी से जुड़ा सवाल है।
फिलहाल सरकार और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी ने किसानों की चिंता को और भी गहरा कर दिया है। अगर समय रहते किसानों की आवाज नहीं सुनी गई, तो यह आंदोलन एक बड़े जनआक्रोश में बदल सकता है।
“जाके पैर न फटी बिवाई”सो क्या जाने पीर पराई,यही बात चरितार्थ हो रही है किसान का दर्द किसान ही समझता है- व्यवसाई नहीं?
"सरकार निजीकरण पर जवाब दे, वरना आने वाली समय में जनता देगी जवाब!"
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