बिलासपुर, 14 अप्रैल
प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा शहर, स्मार्ट सिटी की सूची में शुमार बिलासपुर — लेकिन असल हालात में ये शहर "डार्क सिटी" बनता जा रहा है। आज एक बार फिर सुबह करीब 7 बजे से पुराना बस स्टैंड क्षेत्र में बिजली आपूर्ति ठप है। 11 बजने वाली है, लेकिन बिजली अभी तक बहाल नहीं हुई है।
शिकायत दर्ज कराने के बावजूद कोई समाधान नहीं हुआ। न बिजली विभाग का कोई कर्मचारी मौके पर दिखा, न कॉल सेंटर की तरफ से संतोषजनक जवाब मिला।
सवाल ये है कि आख़िर बिलासपुर में किसके लिए स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट चल रहा है?
एक ओर शहर में करोड़ों के विज्ञापन लगाए जा रहे हैं — "स्मार्ट सड़कों", "स्मार्ट बिजली" और "स्मार्ट गवर्नेंस" की बातें की जा रही हैं — और दूसरी ओर, आम नागरिकों को रोज़ाना 2-3 घंटे बिजली के लिए जूझना पड़ता है।
कौन समझेगा जनता की परेशानी?
घरों में पानी नहीं आ रहा क्योंकि मोटर नहीं चल रही।
बच्चे बिना पंखे के गर्मी में बैठे हैं।
ऑनलाइन काम करने वाले लोग इंटरनेट और चार्जिंग की समस्या से जूझ रहे हैं।
बुजुर्ग और बीमार लोगों को इस उमस में भारी दिक्कत हो रही है।
बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल
बिजली कटौती की न कोई पूर्व सूचना दी जाती है, न किसी कॉल का जवाब ढंग से दिया जाता है। सबसे अहम बात — जब शिकायत दर्ज भी कराई जाती है, तब भी कोई ज़िम्मेदार अधिकारी सामने नहीं आता।
क्या यही है स्मार्ट सिटी का चेहरा?
जब शहर के बीचोंबीच स्थित इलाके — जैसे पुराना बस स्टैंड — बार-बार अंधेरे में डूबते रहें, तो ये सिर्फ बिजली की नाकामी नहीं, बल्कि प्रशासन की संवेदनहीनता और लापरवाही का सबूत है।
बिलासपुर की जनता अब सवाल पूछ रही है —
"कब तक हमें अंधेरे में रखा जाएगा?"
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