CGFILM इंडस्ट्री में फिल्में क्यों नहीं चल रहीं!छोटा बाज़ार, बड़े रिलीज़… कौन करेगा चिंतन?


छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री इन दिनों एक अजीब विरोधाभास का शिकार है। दर्शक कम, फिल्में ज्यादा—और घाटा सबसे ज्यादा फिल्म मेकर्स का। सवाल ये है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?

1. बाज़ार सीमित, रिलीज़ अनगिनत

हिंदी, साउथ और OTT के इस दौर में छत्तीसगढ़ी दर्शक पहले से ही बंटा हुआ है।

महीने में एक आम दर्शक सिर्फ 1–2 फिल्मों का खर्च उठा सकता है।

लेकिन CGFILM इंडस्ट्री में हर महीने 4-6 फिल्में रिलीज़ हो रही हैं।
परिणाम: दर्शक कन्फ्यूज़—और कुल कलेक्शन सबका बंटकर खत्म।


2. OTT और टीवी का अभाव — सबसे बड़ी कमजोरी

दुनिया OTT की ओर जा रही है, लेकिन

CGFILM का कोई समर्पित OTT नहीं,

कोई टीवी चैनल नहीं,

और न ही कोई डिजिटल विंडो जहां लोग सस्ती कीमत पर फिल्म देख सकें।
इसका मतलब—फिल्म का जीवनकाल सिर्फ 7–10 दिन का।
उसके बाद फिल्म हवा में गायब।


3. कमजोर प्लानिंग और ज़ीरो मार्केट रिसर्च

हर फिल्म बिना रणनीति और रिसर्च के बन रही है।
प्रोड्यूसर करोड़ों का रिस्क उठा रहे हैं लेकिन

दर्शक की पसंद,

रिलीज़ टाइमिंग,

कंटेंट क्वालिटी
किसी पर ध्यान नहीं।
नतीजा— एम ए preveous, वो तेरी, और अब ‘जानकी’ जैसे कई प्रोजेक्ट्स बॉक्स ऑफिस पर ढेर।


4. इंडस्ट्री में एकता का अभाव

CGFILM की सबसे बड़ी समस्या

कोई साझा मार्केटिंग प्लान नहीं,

रिलीज़ कैलेंडर नहीं,

एक-दूसरे से कॉम्पिटिशन में सब एक-दूसरे की कमाई काट देते हैं।
एक ही हफ्ते 2–3 फिल्में टकरा जाती हैं—नुकसान सबका।


5. दर्शकों के पास विकल्प बहुत, पॉकेट छोटी

बॉलीवुड, साउथ, वेब सीरीज़, यूट्यूब—हर ओर कंटेंट की बाढ़ है।
ऐसे में दर्शक CGFILM को मौका देना चाहता है,
लेकिन महीना भर में

टिकट,
पॉपकॉर्न,
ट्रांसपोर्ट
सब मिलाकर खर्च बढ़ जाता है।
वो सोचता है—“एक ही देखूँगा, कौन-सी देखूँ?”
और इसी दुविधा में CGFILM का दर्शक टूट जाता है।


सच्चाई यह है—CGFILM इंडस्ट्री ‘ओवर प्रोडक्शन’ और ‘अंडर मार्केट’ का शिकार है।

जब तक इंडस्ट्री

नियंत्रित रिलीज़,

कंटेंट सुधार,

OTT/डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म,

और साझा मार्केटिंग
पर ध्यान नहीं देगी…


तब तक
पैसा लगेगा,
फिल्में बनेंगी,
लेकिन दर्शक नहीं मिलेंगे।

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