10 साल में बनी ‘भक्त माँ कर्मा’, अब रिलीज़ से पहले नेताओं के दरबार—क्या यही है प्रमोशन?

शेष यादव की रिपोर्ट-

छत्तीसगढ़ में बनी बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘भक्त माँ कर्मा’ आखिरकार रिलीज़ के करीब है। इस फिल्म को बनने में पूरे दस साल लगे—एक दशक की मेहनत, संघर्ष और उम्मीदें इसमें जुड़ी हैं। लेकिन रिलीज़ से ठीक पहले फिल्म के मेकर्स का फोकस कहानी या दर्शकों से जुड़ाव पर नहीं, बल्कि नेता-मंत्रियों के दरवाज़ों पर दस्तक देने में ज़्यादा दिखाई दे रहा है।

लगातार मुलाकातों और फोटो-ऑप्स के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है—क्या छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, जहाँ फिल्म इंडस्ट्री को आज तक ठोस समर्थन नहीं मिला, वहाँ नेताओं से मिलना वाकई फायदेमंद है?
हकीकत यह है कि प्रदेश की फिल्म इंडस्ट्री को न तो कोई ठोस पॉलिसी मिली, न इंफ्रास्ट्रक्चर, और न ही वो माहौल जिसमें फिल्में बड़े स्तर पर पनप सकें। ऐसे में जिन लोगों ने कभी इस इंडस्ट्री को प्राथमिकता ही नहीं दी, उनसे उम्मीद लगाना क्या सिर्फ समय की बर्बादी नहीं?
फिल्म प्रमोशन का असली मैदान आज दर्शक, सोशल मीडिया और कंटेंट हैं। वहीं फिल्में बनती भी हैं और चलती भी। लेकिन ‘भक्त माँ कर्मा’ के प्रमोशन में अब तक जो तस्वीर सामने आई है, उसमें पब्लिक कनेक्ट कम और पॉलिटिकल कनेक्शन ज़्यादा नजर आ रहा है।
अब देखना होगा कि क्या ये रणनीति फिल्म को फायदा पहुंचाती है या फिर यह एक ऐसे रास्ते पर चलने जैसा साबित होगा, जहाँ शोर तो बहुत है, लेकिन दर्शक नहीं।

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