"थाना प्रभारी की चुप्पी बनी अपराधियों की ढाल! पत्रकार का कॉल उठाना भी जरूरी नहीं समझते, सवाल है – किससे डरते हैं?"

जब कोई पत्रकार किसी जनहित की खबर पर अपडेट लेने के लिए जिम्मेदार अधिकारी से संपर्क करता है, तो यह न केवल उसकी पेशेवर जिम्मेदारी है, बल्कि लोकतंत्र की उस रीढ़ की हड्डी का हिस्सा है जो जवाबदेही पर टिकी है। लेकिन बिलासपुर के तारबाहर थाना प्रभारी ने इसी जिम्मेदारी को मजाक बनाकर रख दिया।

तारबाहर थाने क्षेत्र में चोरी की खबर (जो 23 अप्रैल को प्रकाशित हुई थी) की अपडेट के लिए जब बिलासपुर TIME सम्पादक ने थाना प्रभारी को कॉल किया, तो न सिर्फ फोन उठाने से परहेज किया गया, बल्कि कॉल बैक करना भी उन्हें ज़रूरी नहीं लगा।

सवाल उठता है — क्या ये लापरवाही है या जवाबदेही से बचने की रणनीति?

"शहर में बढ़ते अपराध और थानों में बढ़ती चुप्पी!"

यह कोई एक थाना प्रभारी की बात नहीं है। बिलासपुर शहर में कई थाना प्रभारियों की यही रवैया बन चुकी है – ना सवाल सुनना, ना जवाब देना। जनता परेशान है, मीडिया संवादहीन और अपराधी बेफिक्र।

जब थाना प्रभारी संवाद से डरने लगे, तो समझिए कहीं न कहीं गड़बड़ जरूर है। यह चुप्पी किसी "ऑफिशियल प्रोटोकॉल" का हिस्सा नहीं, बल्कि अपराधों पर पर्दा डालने की कोशिश भी हो सकती है।



"फोन न उठाना क्या नया तरीका है सच्चाई से भागने का?"

पत्रकारों को जवाब देना सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि संविधानिक जिम्मेदारी है। थाना प्रभारी जैसे पद पर बैठा कोई भी व्यक्ति मीडिया से संवाद करने से अगर कतराए, तो ये स्पष्ट संकेत है कि वह या तो जवाब नहीं देना चाहता, या देने लायक कुछ है ही नहीं।


"थाना संवादहीन, अपराध बेलगाम – कौन उठाएगा जिम्मेदारी?"

बिलासपुर TIME अब यह सवाल सिर्फ एक पत्रकार नहीं, बल्कि पूरे शहर की जनता की तरफ से पूछ रहा है – क्या हमारे थाने अब ‘चुप्पी की चारदीवारी’ बनते जा रहे हैं? क्या जनता की सुरक्षा से जुड़े सवालों का जवाब देने से भी बचा जाएगा?



अगले एपिसोड में हम उठाएंगे – किस थाना में कौन बन चुका है 'लोकल बेताज बादशाह' जो खुद को सवालों से ऊपर समझता है।
खबर के साथ बने रहिए — सच्चाई को बेनकाब किया जाएगा। 

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