"घातक" पत्रकारिता नहीं, आपकी चुप्पी थी – जो इंडस्ट्री को दीमक की तरह खा गई थी"।


 कुछ स्वघोषित तथाकथित निर्देशक जो अपने आप को निर्माता कहने से भी बाज नहीं आते जिनके खाते मे फ्लॉप फिल्म और फ्लॉप एल्बम गाने के अलावा कुछ भी शेष नहीं है।

आज पत्रकारों और यूट्यूबर पर आरोप लगाकर अपनी नाकामियों की राख को ढंकने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सच यही है कि जब पर्दे के पीछे शोषण, भाई-भतीजावाद, झूठी स्टारडम और मौत जैसी घटनाएं हो रही थीं – तब आप जैसे लोग 'शांति के पुजारी' बनकर मुंह में दही जमा कर बैठे थे। 

आज जब पत्रकारों ने सवाल उठाने शुरू किए, तब आपको इंडस्ट्री की 'भलाई' याद आई?

अगर आपको "सहयोग, सहभागिता और मित्रता" का इतना ही ध्यान था, तो आपने कभी घटिया फिल्मों, कलाकारों की छंटनी, या सेट पर की गई गाली-गलौज के खिलाफ पोस्ट क्यों नहीं किया?

और रही बात "जलन, भड़ास और ओछी मानसिकता" की—
तो साहब, सच बोलना जलन नहीं होता।
धोखे को उजागर करना भड़ास नहीं होता।
सवाल पूछना ओछी मानसिकता नहीं होती।

आपका ये रोना-धोना इस बात का सुबूत है कि आप आलोचना नहीं, चापलूसी के भूखे हैं।
हमारा काम है सवाल पूछना, और वो जारी रहेगा।
इंडस्ट्री को बर्बाद पत्रकार नहीं कर रहे, बल्कि चुप रहने वाले आप जैसे नकली हितैषी कर रहे हैं।

ऐसे लोग इंडस्ट्री में हुई किसी भी घटना पर घड़ियाली आँसू बहाने पर बाज नही आते प्रोड्यूसर्स और हर कलाकार को बकरा समझना आपकी ओछी मानसिकता का परिचायक है। 

सीजी फ़िल्म के  दर्शक(जनता)के मन में यह सवाल उठना लाज़िमी  है कि फ़िल्मों का मुहूर्त बड़े और आलीशान होटल में होने के बाद भी वो फ़िल्म बंद बॉक्स में क्यों चली जाती है?
ऐसे बहुत से हताश और निराश निर्माता और निर्देशक से जब यह सवाल पूछा जाता है तो वे तिलमिला जाते है,आख़िर क्यों...?



आपका घमंड टूटेगा,
हमारी कलम नहीं।

बिलासपुर TIME के पत्रकार शेष यादव की ओर से।

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