जिस प्रकार खेतों में अधिक पैदावार की चाहत में आवश्यकता से अधिक रासायनिक खाद डालने से अनाज ज़हरीला हो जाता है, ठीक उसी प्रकार आज हमारी कला-संस्कृति भी ‘सस्ती लोकप्रियता’ और तात्कालिक सफलता की अंधी दौड़ में अश्लीलता का ज़हर पी रही है। छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री, जो अब अपने सिल्वर जुबली वर्ष में प्रवेश कर चुकी है, इस समय एक गंभीर सांस्कृतिक संकट से गुजर रही है।
हाल ही में एक कलाकार, किशन सेन, के वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर जिस प्रकार से विरोध और चर्चा देखने को मिला, उसने इस मुद्दे को फिर से सतह पर ला दिया है। हालांकि यह पहली बार नहीं है, जब छत्तीसगढ़ी कला में इस प्रकार की अश्लीलता देखने को मिली हो।
इतिहास खुद दोहरा रहा है
वर्ष 2009 में आई छत्तीसगढ़ी फिल्म "मया" आज भी इस बहस का एक महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जाती है। इस फिल्म का निर्माण इंडस्ट्री के जाने-माने निर्माता रॉकी दासवानी ने किया था और निर्देशन सतीश जैन द्वारा किया गया था। विवादित गाने को न केवल पद्मश्री अनुज शर्मा पर फिल्माया गया था, बल्कि मोहन सुंदरानी द्वारा इसे म्यूजिक कंपनी के माध्यम से पूरे प्रदेश में प्रचारित किया गया।
सवाल उठता है—
क्या उस समय छत्तीसगढ़ी सिनेमा को अपनी पहचान के लिए ऐसे गानों की ज़रूरत थी? क्या बिना अश्लीलता के एक सार्थक सफल फिल्म नहीं बन सकती थी?
अश्लीलता का वर्तमान रूप आज जब इंडस्ट्री परिपक्वता की ओर बढ़ रही है, तो अपेक्षा की जाती है कि कला-संस्कृति का स्तर और ऊंचा होगा। लेकिन हालात इसके ठीक विपरीत हैं। कुछ निर्माता-निर्देशक अश्लील दृश्यों और बोलों के माध्यम से सोशल मीडिया की सस्ती लोकप्रियता बटोरने में लगे हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि कुछ युवा महिलाएं भी ऐसे कंटेंट में भागीदारी कर रही हैं, जिससे समाज में उनकी गरिमा और आत्मसम्मान पर भी प्रश्न उठते हैं।
खामोश हैं जिम्मेदार चेहरे
आश्चर्यजनक यह है कि छत्तीसगढ़ी सिनेमा के वे बड़े नाम, जिन्हें समाज आदर्श मानता है, इस विषय पर या तो मौन हैं या फिर परोक्ष रूप से इसे नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। हालांकि हाल ही में लोकगायिका अलका चंद्राकर ने एक इंटरव्यू में स्वीकार किया कि उन्होंने “मया” में जो अश्लील गीत गाया था, वह एक भूल थी और इसी कारण उन्होंने उसके बाद कभी भी सतीश जी की फिल्मों में नहीं गाया।
कहाँ है सरकारी जवाबदेही?
राज्य सरकार की फिल्म सिटी जैसी योजनाएं सिर्फ घोषणाओं तक सीमित रह गई हैं। राज्य महिला आयोग भी इन मामलों में मौन साधे बैठा है। संस्कृति विभाग, जो इस दिशा में पहल कर सकता है, वह भी निष्क्रिय बना हुआ है।
समाज में आज बिना किसी भय के अश्लील वीडियो, गाने और एल्बम जारी किए जा रहे हैं। यह ना केवल सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि बहन-बेटियों की गरिमा को भी ठेस पहुँचा रहा है।
समाधान की ओर कदम जरूरी
सरकार को चाहिए कि राज्य स्तरीय सेंसर बोर्ड का गठन करे, जो क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों और एल्बमों में प्रसारित हो रही अश्लीलता पर नज़र रखे और समय रहते रोक लगाए। इसके साथ ही आम नागरिकों, कलाकारों और समाज के बुद्धिजीवियों को भी चाहिए कि वे इस विषय में खुलकर बोलें, बहिष्कार करें और विरोध दर्ज कराएं।
समाप्ति में…
अगर आज इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो कला के नाम पर परोसी जा रही अश्लीलता भविष्य की पीढ़ियों को विरासत में एक दूषित संस्कृति दे जाएगी। यह समय सिर्फ सवाल उठाने का नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक गरिमा अस्मिता की रक्षा के लिए एकजुट होकर कार्य करने होंगे तभी तो लोग स्वीकारेंगे छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया।
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