वन विभाग के DFO कार्यालय में बैठे बाबुओं का दादागिरी भरा रवैया एक बार फिर सामने आया है। आम जनता से लेकर मीडिया कर्मी तक—हर कोई परेशान है, लेकिन अफसरों और बाबुओं को जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता।
एक हालिया वाकये में जब एक पत्रकार ने एक ज़रूरी प्रशासनिक जानकारी के लिए अधिकारी का संपर्क नंबर माँगा, तो जवाब मिला –
"साहब ने मना किया है नंबर देने से। मीडिया हो या कोई और, हमें मतलब नहीं। जहां शिकायत करना है कर दो।"
क्या यही है "जनसेवा" का चेहरा? क्या यही है वो सरकारी तंत्र जो जनता के टैक्स पर तनख्वाह ले रहा है?
⛔ जनता को इंतज़ार, बाबुओं को ऐंठन
सुबह से लाइन में बैठे लोग, हाथ में आवेदन, चेहरे पर उम्मीद। लेकिन बाबुओं को ज़रूरत है तो सिर्फ़ "सिफारिश" और "पहचान" की। आम आदमी का काम हो या पत्रकार का सवाल—अगर 'ऊपर से' बात न हो, तो जवाब मिलता है 'जो करना है कर लो'।
📵 जवाबदेही का गला घोंटा गया
जब मीडिया कर्मी ने DFO या किसी सक्षम अधिकारी का नंबर माँगा, तो बाबुओं ने बदतमीजी की सारी हदें पार कर दीं। अफसोस की बात ये है कि ये घटना छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में हो रही है, जहाँ शासन खुद को "जनता का शासन" कहता है।
❗ सवाल ये है:
क्या वन विभाग अब 'राजशाही' चला रहा है?
DFO कार्यालय में बैठे बाबुओं को किसका संरक्षण प्राप्त है कि वे मीडिया से भी यूं बात कर सकें?
क्या ये दफ्तर जनता के लिए है, या सिर्फ चुनिंदा लोगों के लिए?
हम ये नहीं भूल सकते कि लोकतंत्र में हर अफसर जनता का सेवक होता है, मालिक नहीं! और अगर कोई सरकारी कर्मचारी मीडिया को भी धमकी देने लगे, तो ये संकेत है कि विभाग के भीतर बहुत कुछ सड़ चुका है।
बिलासपुर TIME मांग करता है कि:
DFO कार्यालय में बैठे कर्मचारियों की जवाबदेही तय की जाए।
CCTV फुटेज खंगालकर उक्त कर्मी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो।
जनता और मीडिया से इस तरह की बदतमीजी को शून्य सहनशीलता की श्रेणी में लिया जाए।
यदि आपकी भी वन विभाग से कोई शिकायत है, तो हमें लिख भेजिए – अब वक्त आ गया है कि ये तंत्र सुधरे, नहीं तो जनता सवाल पूछना जानती है।
0 Comments