धार्मिक आस्था और भक्ति के नाम पर आज बिलासपुर में जो कुछ भी हुआ, वह एक व्यवस्थागत शर्मिंदगी और आयोजन कुप्रबंधन का जीता-जागता उदाहरण बन गया। बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री एक सामूहिक विवाह कार्यक्रम में आशीर्वाद देने आए थे — लेकिन ना दर्शन हुए, ना व्यवस्था, सिर्फ अफरातफरी, चोरी, और दर्द की कहानियाँ बिखरती रह गईं।
आयोजक सिर्फ नाम के: अनुभवशून्य टीम ने रच डाली अराजकता
कार्यक्रम के आयोजक जित्तू यादव पूरी तरह से आयोजन प्रबंधन में विफल साबित हुए। जगह छोटी, आमंत्रण खुले, और भीड़ बेकाबू — यह साफ़ दर्शाता है कि इन आयोजकों को भीड़ प्रबंधन का कोई अनुभव नहीं था। हजारों लोगों की मौजूदगी वाले कार्यक्रम को ऐसे स्थान पर आयोजित करना एक आत्मघाती निर्णय था।
धीरेंद्र शास्त्री नहीं कर पाए विवाह स्थल प्रवेश
भारी भीड़ और अव्यवस्था के कारण स्वयं धीरेंद्र शास्त्री विवाह स्थल तक नहीं पहुंच पाए। उन्हें कार से ही आशीर्वाद देना पड़ा, और फिर उन्हें कार्यक्रम स्थल से लौटना पड़ा, जिससे श्रद्धालुओं में गहरी निराशा फैल गई।
जिस उद्देश्य से लोग दूर-दराज़ से आए थे, वो उद्देश्य अधूरा ही रह गया।
न दर्शन, न सुरक्षा: भक्तों की जेबें कटीं, आंसू बहे
कार्यक्रम स्थल पर सुरक्षा नाम की कोई चीज़ नहीं थी। महिलाओं के गहने, श्रद्धालुओं के पर्स, मोबाइल और अन्य कीमती वस्तुएं चोरी हो गईं।
कई भक्तों को रोते और सामान खोजते देखा गया, लेकिन आयोजक और प्रशासन दोनों ने मुँह फेर लिया।
प्रशासन भी बना मूकदर्शक
स्थानीय प्रशासन का रवैया इस पूरे आयोजन में पूर्णतः गैर-जिम्मेदाराना रहा।
ना ट्रैफिक नियंत्रण
ना पर्याप्त पुलिस बल
ना आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था
यह सब कुछ एक त्रासदी को न्योता देने जैसा था।
भक्ति के नाम पर मज़ाक, श्रद्धा के नाम पर अपमान
आज का दिन उन हजारों श्रद्धालुओं के लिए सिर्फ एक धोखा और मानसिक पीड़ा लेकर आया।
जहाँ लोगों को आशीर्वाद और उत्सव की उम्मीद थी, वहाँ उन्हें अव्यवस्था, अपमान और आंसू मिले।
सवाल उठता है:
क्या धार्मिक आयोजनों के नाम पर सिर्फ भीड़ जुटाना ही सफलता है?
क्या प्रशासन और आयोजक की ज़िम्मेदारी सिर्फ मंच सजा देना है?
क्या श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सम्मान अब कोई मायने नहीं रखते?
इस विफल आयोजन की जवाबदेही किसकी है?
और क्या जिन लोगों का सामान चोरी हुआ, उन्हें न्याय मिलेगा?
🙏 आस्था टूटे नहीं, लेकिन अब सवाल पूछना ज़रूरी है।
बिलासपुर में आज जो हुआ, वो एक चेतावनी है — कि भक्ति और व्यवस्था में संतुलन टूटेगा, तो अनर्थ होगा।
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