मोर छैंहा भुइँया 3: एक आइकोनिक विरासत का बिखराव या सिनेमा के नाम पर व्यापार?MCB 3 ने जनता की उम्मीदों को रौंदा — मन को निकाला, भावना को मारा, अब सिर्फ़ व्यापार ही बचा!”




छत्तीसगढ़ी सिनेमा के इतिहास में "मोर छैंहा भुइँया" सिर्फ एक फ़िल्म नहीं, एक भावना थी। गाँव, मिट्टी, परिवार और अपनेपन से जुड़ी वो कहानी जिसने दर्शकों के दिल में स्थायी जगह बनाई। लेकिन तीसरी कड़ी MCB 3 देखकर दर्शक ये सवाल कर बैठे हैं – क्या ये वही फ़िल्म सीरीज़ है जिसने हमें अपनी ज़मीन से जोड़ दिया था?

संस्कृति से कटाव, कहानी में भटकाव
MCB 3 के शुरू होते ही हत्या, खूनखराबा और बदले की भावना हावी हो जाती है, लेकिन इन घटनाओं में पुलिस या क़ानून का कोई अस्तित्व ही नहीं दिखता। नब्बे के दशक की हिंदी फिल्मों — वास्तव, करण अर्जुन, जीत, ज़िद्दी — का मिश्रण बनाकर सतीश जैन ने जैसे छत्तीसगढ़ी सिनेमा को उसकी आत्मा से ही काट दिया हो। सवाल ये उठता है कि क्या सतीश जैन अब भी पुराने बॉलीवुड के मोह से बाहर नहीं आ पा रहे? या फिर ये मल्टी-स्टारर प्रयोग असल में भ्रमित दिशा की ओर पहला कदम था?

वेशभूषा और कला का अभाव, संस्कृति लुप्त
छत्तीसगढ़ की पहचान मानी जाने वाली वेशभूषा, बोली-बानी और संस्कृति फिल्म में कहीं नज़र नहीं आती। म्यूजिक हल्का, क्लाइमेक्स कमजोर और प्रशासन को मज़ाक बनाते हुए दिखाना — ये सब दर्शकों के लिए चौंकाने वाला है।

कलाकारों से कटाव, भावनाओं का गला घोंटा गया
प्रकाश अवस्थी ने भले ही दमदार अभिनय किया हो, और दीपक की चुलबुली अदाएं राहत देती हों, लेकिन मन कुरैशी जैसे अभिनेता को तीसरे पार्ट से बाहर कर देना उन सैकड़ों-हज़ारों दर्शकों के साथ विश्वासघात है जो मन को परदे पर देखने के लिए बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। जैसे पहले पार्ट के बाद अनुज शर्मा को बाहर किया गया, वही खेल अब मन कुरैशी के साथ दोहराया गया।

जनता को मिला धोखा, जुड़ाव की जगह अफसोस
पहले पार्ट की सफलता के 25 साल बाद जब इस फिल्म की घोषणा हुई थी,जनता भावुक हो उठी थी। लेकिन रिलीज़ के बाद लोगों को सिर्फ़ अफसोस मिला। न गाँव-घर से जुड़ाव, न पारिवारिक भावना, न हास्य, न रोमांस – सब कुछ अस्त-व्यस्त।

सतीश जैन से उम्मीद थी, लेकिन इस बार वो भी चूक गए
सतीश जैन वो नाम हैं जो छत्तीसगढ़ी सिनेमा में "अपनापन", "संस्कार", "मिट्टी से लगाव" की पहचान थे। लेकिन MCB 3 में उनका वो जादू, वो गहराई, वो आत्मा कहीं खो गई है। ऐसे में सवाल उठता है — क्या सतीश जैन अब भी वही निर्देशक हैं जिनसे हम ये सब उम्मीद करते हैं?

MCB 3: फिल्म नहीं, व्यापार का ज़रिया?
इस फिल्म में वो सच्चाई, वो जागरूकता, वो समाजिक सन्देश नज़र नहीं आता जो इस सीरीज़ की पहचान हुआ करती थी। अब ना लोग फिल्म से जुड़ पा रहे हैं, ना कलाकारों से। और यही है सबसे बड़ा संकट।


निष्कर्ष:
"मोर छैंहा भुइँया 3" एक भारी अवसर गंवा चुकी है। एक महान विरासत को संभालने की जगह उसे बाजारवाद की भेंट चढ़ा दिया गया। अब दर्शकों की निगाहें इस सवाल पर टिकी हैं — क्या सतीश जैन फिर से वही अपनापन, वही गहराई और वही आत्मा ला पाएंगे, या छत्तीसगढ़ी सिनेमा को भी अब सिर्फ़ 'टिकट खिड़की' से तौला जाएगा?




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