विशेष रिपोर्ट
छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री इन दिनों एक ऐसे संक्रमण काल से गुजर रही है, जहां हर दूसरा इंसान खुद को निर्माता-निर्देशक समझ बैठा है। महज़ 5-7 लाख की पूंजी और थोड़ी बहुत फिल्मी दीवानगी के साथ लोग "मैं भी फिल्म बना सकता हूं" की सोच लेकर मैदान में कूद रहे हैं। नतीजा—ना फिल्म बन पा रही है, ना इंडस्ट्री का नाम बन रहा है।
हर दिन नए प्रोड्यूसर और डायरेक्टर जन्म ले रहे हैं, जो किसी भी तरह किसी बड़े प्रोडक्शन हाउस से जुड़ाव का दिखावा कर फिल्म शुरू तो कर देते हैं, लेकिन अधूरी योजना और अनुभव की कमी के चलते वह फिल्म या तो थम जाती है, या कभी सिनेमाघरों तक पहुंच ही नहीं पाती। इसका सबसे बड़ा नुकसान झेलते हैं—वे कलाकार, तकनीशियन और उन फिल्मों से जुड़ी छवि, जिनका न कोई कसूर होता है, न कोई सहारा।
फिल्म बनी, पर रिलीज़ नहीं हुई—कलाकारों का करियर खतरे में
छत्तीसगढ़ी सिनेमा में ऐसे दर्जनों उदाहरण मिल जाएंगे, जहां हीरो-हिरोइन से लेकर DOP और स्पॉट बॉय तक ने महीनों मेहनत की, लेकिन फिल्म अधूरी रह गई या कहीं गुम हो गई। इससे इन कलाकारों की छवि को गहरा नुकसान होता है। जब वे दूसरे प्रोजेक्ट्स के लिए ऑडिशन देने जाते हैं, तो सबसे पहला सवाल यही उठता है—"अरे वो फिल्म तो कभी रिलीज़ ही नहीं हुई!" ऐसे में उनका आत्मविश्वास और भविष्य दोनों डगमगाने लगते हैं।
'नाम का प्रोड्यूसर', नुकसान सबका
दिक्कत ये है कि इन नवेलों प्रोड्यूसरों को इंडस्ट्री की साख, टीम की मेहनत या दर्शकों की अपेक्षाओं से कोई लेना-देना नहीं होता। उनके लिए फिल्म बनाना एक शौक है, एक सोशल मीडिया शो ऑफ। वे न तो सिनेमाई जिम्मेदारियों को समझते हैं, और न ही बाज़ार की मांग को। इनका फोकस फिल्म की गुणवत्ता या रिलीज़ से ज़्यादा खुद की ‘प्रोड्यूसर’ वाली फोटो खिंचवाने और प्रेस नोट्स में नाम आने तक सीमित रहता है।
इंडस्ट्री की साख पर खतरा
इस ट्रेंड का असर पूरे छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री पर पड़ रहा है। बड़े बैनर अब छोटे डायरेक्टर या लोकल टैलेंट से बचने लगे हैं। गंभीर निवेशक पीछे हट रहे हैं। और सबसे दुखद ये कि कुछ असली, मेहनती और ईमानदार प्रोड्यूसर इस भीड़ में गुम हो जा रहे हैं।
क्या है समाधान?
फिल्म निर्माण के लिए रजिस्ट्रेशन और नियमन ज़रूरी हो।
प्रोडक्शन हाउस और कलाकारों के बीच कानूनी अनुबंध अनिवार्य बने।
एक फिल्म रिलीज़ न हो पाने पर प्रोड्यूसर को जवाबदेह ठहराया जाए।
इंडस्ट्री के भीतर एक मूल्यांकन समिति बने जो किसी भी प्रोजेक्ट की गुणवत्ता की जांच करे।
छत्तीसगढ़ी सिनेमा को बचाना है, तो इन 'फेसबुक प्रोड्यूसरों' और 'शौकिया फिल्ममेकर्स' की हकीकत से आंख मिलानी होगी। नहीं तो हर दिन किसी फिल्म के नाम पर एक नया धोखा जन्म लेता रहेगा—और बर्बाद होगी एक पूरी इंडस्ट्री की मेहनत, उम्मीद और पहचान।
सावधान रहे नए कलाकार और तकनीशियन! इन घटनाओं से नए कलाकारों और फिल्म कर्मियों को सीखना चाहिए। सिर्फ ऑफर, मुहूर्त या सोशल मीडिया लाइमलाइट देखकर किसी भी फिल्म से न जुड़ें। पहले प्रोड्यूसर-डायरेक्टर का ट्रैक रिकॉर्ड देखें, लिखित अनुबंध करें, और यह तय करें कि फिल्म सिर्फ सपना नहीं, हकीकत बनेगी।
हम जल्द लाएंगे उन तथाकथित प्रोड्यूसरों और डायरेक्टरों की लिस्ट, जिनके पागलपन और अपरिपक्वता ने छत्तीसगढ़ी फिल्मों को मज़ाक बना दिया। ताकि अगली बार कोई नासमझ कलाकार उनके झांसे में न आए।
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