"सत्य किसके साथ? सतीश बनाम मोहित की टक्कर ने हिला दी इंडस्ट्री"



कहानी सिर्फ कैमरे के पीछे की नहीं है अब छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री के सम्मान पर सवाल है!निर्देशक सतीश जैन ने मोहित साहू पर गंभीर आरोप लगाए थे—प्रश्न उठाया गया था फिल्म निर्माण की नीयत, कार्यशैली और व्यावसायिक नैतिकता पर। लेकिन आज मोहित साहू ने कोई सफाई नहीं दी—उन्होंने सीधे चुनौती दे दी:
"अगर मैं गलत साबित हुआ, तो फिल्म बनाना छोड़ दूंगा। लेकिन अगर सतीश जैन गलत हुए, तो उन्हें फिल्म छोड़नी पड़ेगी। आइए किसी भी चैनल पर आमने-सामने डिबेट करते हैं!"

छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसा टकराव शायद ही कभी देखने को मिला हो, जहां दो बड़े नाम एक-दूसरे के खिलाफ सार्वजनिक मंच पर उतर आए हों। यह सिर्फ दो व्यक्तियों की लड़ाई नहीं है—यह लड़ाई है छत्तीसगढ़ी सिनेमा की आत्मा की।

जनता जिन्हें परदे पर देखकर तालियां बजाती है, अब उन्हें मंच के पीछे एक-दूसरे की नीयत पर शक करते देख रही है।
सवाल यह है कि इस विवाद में किसे समर्थन मिले? मोहित साहू, जो युवा और उभरते निर्माता हैं? या सतीश जैन, जो दशकों से सिनेमा की पहचान माने जाते रहे हैं?

पर सबसे बड़ा सवाल यह है—आख़िर ये इंडस्ट्री जा कहां रही है?
क्या यह कला और संस्कृति का मंच रह गया है या सिर्फ अहंकार और ईगो की लड़ाई?

छत्तीसगढ़ी सिनेमा कभी लोक गीतों की आत्मा और गांव की मिट्टी से बना था। लेकिन आज इसकी headlines में न कला है, न संस्कृति—बस आरोप, चुनौती और गिरते स्तर की लड़ाई है।

जनता परेशान है—जो सिनेमा उसे पहचान देता है, वही अब सस्ती बयानबाज़ी का अखाड़ा बन गया है।
क्या इन दोनों में से कोई एक आगे आकर इस विवाद को बंद कर सकता है? या फिर हम एक और फिल्म इंडस्ट्री को टूटते हुए देखेंगे?

अब चुप रहने का वक्त नहीं—छत्तीसगढ़ी सिनेमा को खुद फैसला लेना होगा, वरना दर्शक ही एक दिन फैसला कर देंगे।


"क्या आप इस डिबेट को लाइव देखना चाहेंगे?"

"क्या छत्तीसगढ़ी सिनेमा को एक आचार संहिता की ज़रूरत है?"

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