छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले से निकली इस खबर ने वन विभाग की चूलें हिला दी हैं। जिन्हें चौकसी का जिम्मा सौंपा गया, वे ही तस्करी के सरगना बन बैठे। मंगलवार सुबह मोपका चौकी पुलिस ने एक पिकअप को रोका, जो अवैध इमारती लकड़ी से भरा हुआ था। कोई दस्तावेज़ नहीं, कोई जवाबदेही नहीं – बस जंगल की लाशें लदी थीं।
पुलिस को भी भनक नहीं थी कि यह मामला सीधा-सीधा ‘ऊपर तक’ जुड़ा हुआ है। पूछताछ हुई तो पता चला लकड़ी, बिलासपुर वनमंडल के सोंठी जंगल से काटी गई है। तस्करी के पीछे नाम आया वनपाल सूरज मिश्रा और विभाग में पदस्थ एक रेंजर व वनपाल का। अब आप समझ सकते हैं, खेल कितना गहरा है।
तुरंत ही शुरू हुआ "बचाव का खेल"। सूरज मिश्रा खुद मौके पर पहुंचे, हाथ में एक फर्जी बिल लेकर – जैसे ये कोई मामूली चोरी हो और रसूखदारी से रफा-दफा हो जाए। लेकिन किस्मत से वन विभाग की उड़नदस्ता टीम आ धमकी, और लकड़ी समेत पिकअप को जब्त कर लिया गया।
लेकिन क्या सिर्फ इतने पर बात खत्म होती है? नहीं साहब। सूत्रों के अनुसार ये कोई अकेले सूरज मिश्रा का तमाशा नहीं, ये एक संगठित रैकेट है – पूरा जंगल काटने का ठेका लिए बैठे हैं ये लोग। प्लान ये था कि लकड़ियों को फर्नीचर का रूप देकर बाजार में उतारा जाएगा – ताकि न कोई सवाल उठे, न कोई पकड़ सके।
बात यहीं नहीं रुकती। पूर्व में भी ऐसे मामले सामने आए हैं, लेकिन हर बार फर्जी बिल, विभागीय बचाव और ऊपरी संरक्षण के सहारे सारा मामला दबा दिया गया। इस बार भी क्या वैसा ही होगा? या फिर सड़ांध की इस जड़ को उखाड़कर फेंका जाएगा?
सूत्रों का दावा और भी ज़हर घोलता है।बताया जा रहा है कि जब मामला "सेट" हो गया, जब पिकअप को कागज़ों की आड़ में छुपा दिया गया — तो रात होते-होते शराब की बोतलें खुलीं और जश्न मनाया गया। अब सवाल उठता है सरकारी कर्मचारी आखिर क्यों रात 9–9:30 बजे तक कार्यालय में टिके रहे?ये फर्ज था या फिर फर्ज़ीवाड़े का जश्न?
अगर यही "ऑफिस टाइम" है, तो समझ लीजिए – छत्तीसगढ़ के जंगल अब फाइलों में काटे जाएंगे, और जाम में डुबोकर बेचे जाएंगे।
जवाबदारी तय होनी चाहिए – वरना ये जंगल नहीं, पूरा सिस्टम सड़ जाएगा।
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