इन दिनों कुछ तथाकथित फिल्मप्रेमी और सोशल मीडिया के “थिंक टैंक” यह कहकर छत्तीसगढ़ी फिल्मों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं कि –
“कॉपी तो बॉलीवुड ने भी की है… तो सीजी इंडस्ट्री को क्यों दोष?”
तो सुनिए—बॉलीवुड ने प्रेरणा ली है, रीमेक बनाए हैं, लेकिन प्रस्तुति में दम दिखाया है, स्केल पर खेला है, और सबसे ज़रूरी बात – दर्शकों की उम्मीदों को क्राफ्ट में बदला है।
सीजी सिनेमा में हो क्या रहा है?
एक ही साउथ या बॉलीवुड फिल्म को सीधा-सीधा पटककर, लोकल किरदारों के नाम बदलकर, यू-ट्यूब क्लिप्स से सीखकर फिल्में बनाई जा रही हैं – फिर उस पर चिल्लाकर प्रचार किया जाता है कि “ये छत्तीसगढ़ी सिनेमा का गोल्डन युग है!”
सवाल है — जब वही कहानी पहले से सैकड़ों भाषाओं में OTT पर मौजूद है, तो दर्शक उसे सीजी में क्यों देखें?
प्रेरणा लेना अपराध नहीं है — लेकिन उसे अपना रंग, अपना ज़मीन, और अपनी संस्कृति में फिर से गढ़ने की ज़िम्मेदारी फिल्ममेकर की होती है।
बॉलीवुड ने जब ‘3 इडियट्स’, ‘राज़ी’, ‘शेरशाह’, "ghajini", "तेरे नाम", या "बाजीगरी",बनाई, तो उसमें सिर्फ कहानी नहीं थी — उसमें संवेदना, रिसर्च, और प्रस्तुति की ऊँचाई थी।
लेकिन सीजी फिल्म में क्या है?
एक ही तरह की पटकथा
एक जैसे क्लाइमेक्स
औसत एक्टिंग
और फिर “प्रेरणा” का बहाना।
किसे बेवकूफ बना रहे हो?
असल में यह पूरा तर्क अपनी कमज़ोरियों और चोरी को लीपापोती करने का जरिया बन गया है।
जब आलोचना होती है, तो तुलना में बॉलीवुड-हॉलीवुड की बात करते हैं,
लेकिन जब मेहनत की बात आती है — तो कहते हैं “हम तो लो बजट हैं, हमारे पास साधन नहीं।”
तो फिर दर्शक क्यों अपना समय और पैसा दे?
छत्तीसगढ़ी सिनेमा को अगर वाकई बदलना है — तो उसे सिर्फ फिल्म बनाना नहीं, दर्शकों से रिश्ता बनाना होगा।
नई सोच, नए आइडिया, और नए लोगों को लाना होगा।
क्योंकि सच्चाई यही है:
अगर आप युवा दर्शकों को नहीं जोड़ पाए, तो आप केवल बुढ़ाते दर्शकों के लिए तुकबंदी रचते रह जाएंगे।
चलती रहेंगी फिल्में, बनते रहेंगे मेकर्स — लेकिन इतिहास सिर्फ उन्हें याद रखता है, जो कुछ नया लाए।
बाकी, कॉपी का नाम “प्रेरणा” रख लेने से न चोरी छिपती है, न दर्शक मूर्ख बनते हैं।
…लेकिन आजकल अजीब दृश्य देखने को मिल रहा है।
कुछ ऐसे लोग भी "प्रेरणा" और "तुलना" की बातें कर रहे हैं,
जो खुद समीक्षक की कुर्सी बेचकर, सिर्फ फिल्म में रोल या सेट पर चाय पकड़ाने के लिए अपनी कलम गिरवी रख चुके हैं।
ये वही लोग हैं जो एक वक़्त फिल्म को जी-भर कोसते थे,
और आज उसी फिल्म के "गोलगप्पा डायलॉग" को मास्टरपीस बता रहे हैं।
कब तक चलेगा ये जीरो अभिनय और सौ में से सौ भाई-भतीजावाद का दौर?
अगर सच में छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री को बचाना है —
तो चापलूसी और चमचागिरी का मोह त्यागना होगा।
नए प्रोड्यूसर जो सपनों के साथ फिल्म लाइन में आते हैं,
उन्हें ये नहीं पता होता कि हर गली में बैठे कुछ "फिल्मबाज" सिर्फ उन्हें चूसकर फेंक देने के लिए तैयार हैं।
इन शिकारी लोगों से बचाने के लिए ज़रूरी है कि पत्रकार, समीक्षक और दर्शक — सभी अपनी ज़िम्मेदारी समझें।
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