"बिलासपुर की ट्रैफिक व्यवस्था रसूखदारों के आगे बेबस, गरीबों पर ही चलती है लाठी!"

बिलासपुर शहर में ट्रैफिक पुलिस की लाचारी अब किसी से छुपी नहीं है। शहर के सबसे व्यस्त और चर्चित मार्ग — यातायात मुख्यालय से महज़ चंद कदम दूर स्थित सत्यम चौक से लेकर अग्रसेन चौक तक — की तस्वीरें यह चीख-चीखकर बयां कर रहे हैं कि यहां व्यवस्था नहीं, सिर्फ़ दिखावा है।

सड़क के बीचों-बीच बेतरतीब खड़ी कारें इस बात का सबूत हैं कि नियम सिर्फ गरीबों के लिए बने हैं। रसूखदारों की गाड़ियाँ चाहे आधी सड़क रोक दें, पुलिस की नज़र तक नहीं जाती।

आश्चर्य की बात तो यह है कि आज खुद SSP साहब इसी मार्ग से गुज़रे, लेकिन शायद कानून के रखवालों की आंखें रसूख और रुतबे के सामने बंद हो जाती हैं।

पुलिस महकमे की ओर से हर रोज प्रेस विज्ञप्तियाँ जारी की जाती हैं, कार्यवाही के दावे किए जाते हैं। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त इससे उलट है — सख्ती सिर्फ मध्यम वर्ग और रोज़ कमाने-खाने वाले गरीबों पर दिखती है।

क्या ट्रैफिक कानून सिर्फ नंबर प्लेट देखकर लागू होंगे?
क्या अब व्यवस्था का मतलब यह रह गया है कि रसूख देखकर आँख मूंद ली जाए और गरीब को चालान थमा दिया जाए?

यह सवाल अब जनता पूछ रही है — और जवाब भी चाहती है।
बिलासपुर की सड़कों पर अराजकता फैलती जा रही है, और जिम्मेदार सिर्फ चुप हैं... या फिर selective action में व्यस्त।

शहर के कई ऐसे मुख्य इलाके हैं, जहां सड़कों के आधे हिस्से पर दुकानें सज चुकी हैं—जिनमें बड़े व्यापारियों और प्रभावशाली लोगों के व्यवसाय शामिल हैं। वहां न तो चालान होता है, न ही सख़्ती दिखाई देती है। सवाल ये है कि क्या यातायात बाधित करने वाले सिर्फ गरीब ही होते हैं?

कानून सबके लिए बराबर क्यों नहीं है?
अगर ठेले-गुमटी वालों पर कार्यवाही जायज़ है, तो फिर उन रसूखदारों के खिलाफ चुप्पी क्यों? क्या ट्रैफिक पुलिस की नजर सिर्फ उन पर ही टिकी रहती है जो अपना पेट भरने के लिए सड़क किनारे छोटा-मोटा व्यवसाय कर रहे हैं?

जिम्मेदारों को जवाब देना होगा
हर बार प्रेस विज्ञप्ति निकालकर कार्यवाही का दावा किया जाता है, लेकिन जब हक़ीक़त की तस्वीरें सामने आती हैं, तो साफ़ दिखता है कि कार्यवाही का फोकस सिर्फ गरीबों पर है।

“यहां व्यवस्था नहीं, सिर्फ दिखावा है।”

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