रिपोर्टर: शेष यादव | बिलासपुर TIME
छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री में एक अजीब चलन बन चुका है—फ़िल्मों का बड़े दावे के साथ ऐलान करना, मुहूर्त कराना, ऑडिशन लेना, सोशल मीडिया पर पोस्टर और "कमिंग सून" की झड़ी लगाना... लेकिन जब बात फिल्म पूरी करने या रिलीज़ करने की आती है, तो सब कुछ धुआं बनकर उड़ जाता है।
ये किस तरह की फिल्म निर्माण प्रक्रिया है, जो सिर्फ शब्दों और तस्वीरों में रह जाती है?
उदाहरण ही काफी हैं...
"काली: द फाइनल वर्डिक्ट" — फिल्म के मेकर्स सालों से दावा करते आ रहे हैं कि फिल्म बन गई है, सिर्फ रिलीज़ बाकी है। लेकिन अब तक इसका कोई ट्रेलर, टीज़र, न स्क्रीनिंग—कुछ नहीं।
"असुर" — ये फिल्म तो मानो सालों से "शूटिंग" के नाम पर चल रही है। कुछ दृश्य शूट हो गए, कुछ जगहों पर शूटिंग की खबरें आईं, लेकिन फिल्म कभी पूरी हो ही नहीं सकी।
"गणितबाज़" — फिल्म का मुहूर्त हो चुका है। बाकायदा कैमरा पूजा और फोटो सेशन हुआ था, लेकिन उसके बाद यह प्रोजेक्ट किसी गुमनाम गली में खो गया।
"शिवा पुत्र", "नायक भले दिनों की बात", "बिरीटिया बाबा" हाय मोर दिल,
भाई भाई के मया,रंग दे मोला प्रेम रंग में,
संगी रे — ये सिर्फ नाम नहीं हैं, बल्कि उस उम्मीद और मेहनत की लाशें हैं जो कलाकारों, दर्शकों और टीम ने इनमें डाली थी।
नुकसान किसका हुआ?
दर्शकों को झूठे वादों और अधूरी उम्मीदों से धोखा मिला।
युवा कलाकारों ने अपने करियर की शुरुआत ऐसे प्रोजेक्ट्स से की जो कभी पूरे नहीं हुए।
तकनीशियनों का भुगतान अधूरा रह गया।
और जो सबसे खतरनाक बात है—छत्तीसगढ़ी सिनेमा की साख को गहरा नुकसान हुआ।
सवाल यह नहीं कि फिल्म क्यों नहीं बनी—सवाल यह है कि क्यों ऐलान किया गया था?
क्या फिल्म की घोषणा महज़ एक PR स्टंट है? क्या कुछ तथाकथित निर्माता सिर्फ अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल चमकाने या "निर्माता/निर्देशक" का तमगा पाने के लिए जनता की भावनाओं से खेल रहे हैं?
जब तक इस तरह के गैर-जिम्मेदार व्यवहार पर लगाम नहीं लगेगी, तब तक छत्तीसगढ़ी सिनेमा राष्ट्रीय पहचान नहीं बना पाएगा।
अब समय है कि...
दर्शक सवाल पूछें—किसी भी फिल्म की घोषणा पर आंख बंद कर भरोसा न करें।
कलाकार ठोस कॉन्ट्रैक्ट्स और शर्तों के साथ काम करें।
प्रोड्यूसर्स फिल्म की घोषणा तभी करें जब बजट, स्क्रिप्ट और शेड्यूल फाइनल हो।
और सबसे ज़रूरी—इंडस्ट्री को ऐसे दिखावटी फिल्म निर्माताओं को बेनकाब करना होगा।
छत्तीसगढ़ी सिनेमा में संभावनाएं अपार हैं। लेकिन जब तक झूठे वादों की नींव पर फिल्में बनाई जाती रहेंगी, तब तक सिनेमा सिर्फ पोस्टर और मुहूर्त तक ही सीमित रहेगा।
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